Waqf law: सरकार ने वक्फ कानून का बचाव किया?, जानें सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या हुआ…

नई दिल्लीः केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 “दृढ़ संवैधानिक आधार पर खड़ा है” और कहा कि नया अधिनियमित कानून “आस्था और पूजा के मामलों को अछूता रखते हुए मुस्लिम समुदाय की आवश्यक धार्मिक प्रथाओं का सम्मान करता है, जबकि संविधान द्वारा अधिकृत वक्फ प्रबंधन के धर्मनिरपेक्ष, प्रशासनिक पहलुओं को वैध रूप से विनियमित करता है”।

जवाबी हलफनामे में, अधिनियम के प्रावधानों पर अंतरिम रोक का विरोध करते हुए केंद्र ने कहा कि कानून का “विधायी डिजाइन…यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी व्यक्ति को अदालतों तक पहुंच से वंचित नहीं किया जाएगा, और संपत्ति के अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक दान को प्रभावित करने वाले निर्णय निष्पक्षता और वैधता की सीमाओं के भीतर किए जाएंगे”।

केंद्र ने उच्चतम न्यायालय में ‘वक्फ बाय यूजर’ संपत्तियों पर संशोधित कानून के एक प्रावधान का बचाव किया और कहा कि किसी भी हस्तक्षेप से ‘न्यायिक आदेश द्वारा विधायी व्यवस्था’ बनेगी।

‘वक्फ बाय यूजर’ एक ऐसी प्रथा है, जिसमें किसी संपत्ति को धार्मिक या परोपकारी उद्देश्यों के लिए लंबे समय तक निरंतर उपयोग के आधार पर वक्फ़ (धार्मिक दान) के रूप में मान्यता दी जाती है, भले ही मालिक द्वारा कोई औपचारिक, लिखित वक्फ़ की घोषणा न की गई हो।

प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने 17 अप्रैल को कानून के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई थी, जिसमें ‘वक्फ बाय यूजर’ संपत्तियों को गैर-अधिसूचित करने से संबंधित प्रावधान भी शामिल था, जो आठ अप्रैल तक पंजीकृत नहीं थीं।

सीजेआई ने कहा कि कुछ प्रावधानों के ‘गंभीर परिणाम’ हो सकते हैं, विशेष रूप से वे जो न्यायिक रूप से मान्यता प्राप्त वक्फ संपत्तियों को कमजोर कर सकते हैं और कहा था कि उन्हें ‘‘गैर-अधिसूचित नहीं किया जाना चाहिए’’।

केंद्र के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने अपने 1,332 पन्नों के प्रारंभिक जवाबी हलफनामे में पुराने वक्फ कानूनों के प्रावधानों का हवाला दिया और कहा कि ‘वक्फ बाय यूजर’ सहित वक्फ संपत्तियों का पंजीकरण 1923 से अनिवार्य है।

मंत्रालय ने कहा, ‘‘ अगर किसी अंतरिम आदेश के जरिये प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उस प्रावधान के प्रभाव में हस्तक्षेप किया जाता है, जो केवल पंजीकृत ‘वक्फ बाय यूजर’ को मान्यता देता है, तो यह न केवल उस प्रावधान और उसके उद्देश्य को विफल करेगा, बल्कि इससे कुछ ऐसी विसंगतियां उत्पन्न होंगी, जो किसी न्यायालय के आदेश से नहीं होनी चाहिए…यह न्यायिक आदेश (और वह भी एक अंतरिम आदेश) द्वारा विधायी व्यवस्था के निर्माण के बराबर होगा, जिसमें संसद ने कानून बनाकर जानबूझकर इसे हटा दिया है।

इसमें कहा गया है कि कोई भी अंतरिम आदेश न केवल सार्वजनिक शरारत का कारण बनेगा, बल्कि मुसलमानों को भी नुकसान पहुंचाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Will the middle class get relief from the first general budget of Modi 3.0?
error: Content is protected !!